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श्रम-विभाजन-और-जाति-प्रथा

CLASS 12-PCM . HINDI . आरोह भाग 2 . श्रम विभाजन-और-जाति-प्रथा

Chapter 19 : श्रम विभाजन और जाति-प्रथा

Ch 19

HINDI

CLASS 12-PCM

बाबा साहेब आंबेडकर का जीवन परिचय

डॉ. भीमराव रामजी आंबेडकर का जन्म 14 अप्रैल 1891 को महू, मध्य प्रदेश में हुआ था। वे एक महान समाज सुधारक, विधिवेत्ता, अर्थशास्त्री, समाजशास्त्री, शिक्षाविद् और धर्म-दर्शन के व्याख्याता थे। प्रारंभिक शिक्षा के बाद उन्होंने बड़ौदा नरेश के प्रोत्साहन से उच्च शिक्षा के लिए न्यूयॉर्क और लंदन का भ्रमण किया। आंबेडकर ने संस्कृत सहित अनेक भाषाओं का अध्ययन किया और सामाजिक, धार्मिक तथा ऐतिहासिक विषयों पर गहन शोध किया।

उन्होंने दलितों, स्त्रियों और मजदूरों के अधिकारों के लिए संघर्ष किया और भारतीय संविधान के निर्माता के रूप में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। उनका जीवन सामाजिक समानता और मानव-मुक्ति के लिए समर्पित था।

मुख्य बिंदु

  • जन्म: 14 अप्रैल 1891, महू (मध्य प्रदेश)
  • प्रमुख रचनाएँ: "The Castes in India", "The Untouchables", "Who Are the Shudras?", "Buddha and His Dhamma" आदि
  • शिक्षा: न्यूयॉर्क और लंदन में उच्च शिक्षा
  • संघर्ष: दलितों के अधिकारों के लिए जीवनभर संघर्ष
  • भारतीय संविधान के निर्माता

पाठ्य प्रमाण / उदाहरण

बालक भीमराव ने कहा था, "मैं पढ़-लिख कर वकील बनूँगा, अछूतों के लिए नया कानून बनाऊँगा और छुआछूत को खत्म करूँगा।"

हल किए गए उदाहरण

प्रश्न: बाबा साहेब आंबेडकर ने अपने जीवन का मुख्य उद्देश्य क्या बताया?

उत्तर: उन्होंने अपने जीवन का उद्देश्य अछूतों के लिए नए कानून बनाना और छुआछूत को समाप्त करना बताया।

अभ्यास प्रश्न

  • बाबा साहेब आंबेडकर का जन्म कब और कहाँ हुआ था?
  • आंबेडकर ने किस उद्देश्य से वकालत की?
  • उनके जीवन के मुख्य संघर्ष कौन-कौन से थे?

उत्तर कुंजी

  • 14 अप्रैल 1891 को महू, मध्य प्रदेश में।
  • दलितों के अधिकारों के लिए नया कानून बनाने के लिए।
  • जाति-आधारित उत्पीड़न, सामाजिक समानता, दलितों के अधिकार।

त्वरित संदर्भ

  • आंबेडकर का जन्म मध्य प्रदेश के महू में हुआ।
  • उन्होंने न्यूयॉर्क और लंदन में उच्च शिक्षा प्राप्त की।
  • दलितों के अधिकारों के लिए उनका संघर्ष जीवनपर्यंत रहा।
  • भारतीय संविधान के निर्माता के रूप में उनका योगदान अमूल्य है।

शब्दावली

  • विधिवेत्ता: कानून विशेषज्ञ
  • अछूत: छुआछूत के शिकार व्यक्ति
  • संघर्ष: कठिनाइयों के बावजूद लड़ाई
  • समता: समानता

जाति प्रथा और श्रम विभाजन

जाति प्रथा को अक्सर श्रम विभाजन का एक रूप माना जाता है, लेकिन यह एक दोषपूर्ण और अस्वाभाविक विभाजन है। आधुनिक सभ्य समाज में श्रम विभाजन व्यक्ति की रुचि और क्षमता के आधार पर होता है, जबकि जाति प्रथा में व्यक्ति का पेशा जन्म से ही निर्धारित होता है। यह प्रथा व्यक्ति की स्वतंत्रता और विकास को बाधित करती है और सामाजिक असमानता को बढ़ावा देती है।

मुख्य बिंदु

  • जाति प्रथा श्रम विभाजन का अस्वाभाविक रूप है।
  • व्यक्ति की रुचि और क्षमता की अनदेखी।
  • पेशा जन्म से निर्धारित और परिवर्तन की अनुमति नहीं।
  • जाति प्रथा सामाजिक ऊँच-नीच को जन्म देती है।
  • आर्थिक और सामाजिक दृष्टि से हानिकारक।

पाठ्य प्रमाण / उदाहरण

"जाति-प्रथा पेशे का दोषपूर्ण पूर्वनिर्धारण ही नहीं करती बल्कि मनुष्य को जीवन-भर के लिए एक पेशे में बाँध भी देती है।"

हल किए गए उदाहरण

प्रश्न: जाति प्रथा और श्रम विभाजन में क्या मुख्य अंतर है?

उत्तर: श्रम विभाजन व्यक्ति की रुचि और क्षमता पर आधारित होता है, जबकि जाति प्रथा जन्म से निर्धारित होती है और व्यक्ति को अपने पेशे का चयन करने की स्वतंत्रता नहीं देती।

अभ्यास प्रश्न

  • जाति प्रथा और श्रम विभाजन में क्या अंतर है?
  • जाति प्रथा व्यक्ति की स्वतंत्रता को कैसे प्रभावित करती है?
  • जाति प्रथा के सामाजिक और आर्थिक दुष्परिणाम क्या हैं?

उत्तर कुंजी

  • श्रम विभाजन व्यक्ति की रुचि और क्षमता पर आधारित होता है, जबकि जाति प्रथा जन्म से निर्धारित होती है।
  • यह व्यक्ति को अपने पेशे का चयन करने से रोकती है और सामाजिक ऊँच-नीच को बढ़ावा देती है।
  • यह बेरोजगारी, सामाजिक असमानता और आर्थिक निष्क्रियता को जन्म देती है।

त्वरित संदर्भ

  • जाति प्रथा व्यक्ति की रुचि और क्षमता की अनदेखी करती है।
  • यह व्यक्ति को जन्म से ही एक पेशे में बाँध देती है।
  • जाति प्रथा सामाजिक असमानता और आर्थिक समस्याओं को बढ़ावा देती है।

शब्दावली

  • श्रम विभाजन: कार्यों का वर्गीकरण
  • अस्वाभाविक: प्राकृतिक नहीं
  • पूर्वनिर्धारण: पहले से तय करना
  • बेरोजगारी: काम की कमी
  • सामाजिक ऊँच-नीच: समाज में वर्गों का उच्च-नीच होना

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