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CLASS 12-PCM . HINDI . अभिव्यक्ति और माध्यम भाग 2 . नए और-अप्रत्याशित-विषयों-पर-लेखन

Chapter 9 : नए और अप्रत्याशित विषयों पर लेखन

Ch 9

HINDI

CLASS 12-PCM

नए और अप्रत्याशित विषयों पर लेखन

इस अध्याय में हम सीखेंगे कि कैसे हम नए और अप्रत्याशित विषयों पर अपने विचारों को व्यवस्थित और सुसंगत रूप में लिखित रूप में प्रस्तुत कर सकते हैं। लेखन केवल यांत्रिक कौशल नहीं है, बल्कि यह विचारों को व्याकरणिक शुद्धता के साथ अभिव्यक्त करने की कला है। इस प्रकार के लेखन में विषय की खुली प्रकृति होती है, जिससे लेखक को अपनी सोच को स्वतंत्र रूप से व्यक्त करने का अवसर मिलता है।

मुख्य बिंदु

  • लेखन का उद्देश्य विचारों को स्पष्ट और सुसंगत रूप में प्रस्तुत करना है।
  • अप्रत्याशित विषयों पर लेखन में मौलिकता और स्वतंत्रता होती है।
  • लेखन में सुसंबद्धता और सुसंगति का विशेष ध्यान रखना आवश्यक है।
  • ‘मैं’ शैली का प्रयोग इस प्रकार के लेखन में स्वतंत्र होता है।
  • विभिन्न प्रकार के लेखन जैसे निबंध, संस्मरण, रेखाचित्र, यात्रावृत्तांत आदि इस श्रेणी में आते हैं।

पाठ्य प्रमाण / उदाहरण

लेख में दीवाल घड़ी पर तीन नमूने प्रस्तुत किए गए हैं, जो स्मृति-आधारित, दार्शनिक और अवलोकन-आधारित दृष्टिकोण को दर्शाते हैं। इसके अलावा जातिवाद के विषय पर विश्लेषणात्मक लेख भी दिया गया है।

हल किए गए उदाहरण

दीवाल घड़ी के तीन नमूने और जातिवाद का ज़हर विषय पर लेखन के उदाहरण इस अध्याय में शामिल हैं, जो विभिन्न दृष्टिकोणों और लेखन शैलियों को समझने में मदद करते हैं।

अभ्यास प्रश्न

  • स्तर 1 – सरल: दीवाल घड़ी पर अपने अनुभव को संक्षेप में लिखिए।
  • स्तर 2 – मध्यम: दीवाल घड़ी के तीनों नमूनों में से किसी एक का विश्लेषण कीजिए।
  • स्तर 3 – कठिन: जातिवाद के विषय पर अपने विचारों को विस्तार से लिखिए।

उत्तर कुंजी

  • दीवाल घड़ी पर अनुभव लिखते समय अपनी स्मृतियों और अवलोकनों को स्पष्ट और सुसंगत रूप में प्रस्तुत करें।
  • तीनों नमूनों के विश्लेषण में लेखक के दृष्टिकोण, शैली और विषय की प्रकृति पर ध्यान दें।
  • जातिवाद पर लेखन में सामाजिक तथ्य, विश्लेषण और व्यक्तिगत राय को संतुलित रूप में प्रस्तुत करें।

त्वरित संदर्भ

  • लेखन में सुसंबद्धता और सुसंगति आवश्यक हैं।
  • अप्रत्याशित विषयों पर लेखन में ‘मैं’ शैली का प्रयोग स्वतंत्र होता है।
  • विभिन्न लेखन शैलियों का अभ्यास करें।

शब्दावली

  • सुसंबद्धता: विचारों का आपस में जुड़ा होना।
  • सुसंगति: विचारों का आपस में मेल खाना।
  • अप्रत्याशित विषय: ऐसे विषय जिन पर पहले से तैयारी न हो।
  • मौलिकता: नया और अनूठा विचार।
  • लेखन शैली: लेखन का तरीका या रूप।

लेखन के संदर्भ में सुसंगति और सुसंबद्धता

लेखन में सुसंबद्धता और सुसंगति का होना अत्यंत आवश्यक है। सुसंबद्धता का अर्थ है कि लेख में व्यक्त विचार एक-दूसरे से जुड़े हों, जबकि सुसंगति का अर्थ है कि वे विचार आपस में मेल खाते हों। यदि लेख में विचारों में विरोधाभास या असंगति हो, तो वह लेखन प्रभावहीन और भ्रमित करने वाला हो जाता है।

मुख्य बिंदु

  • सुसंबद्धता और सुसंगति लेखन की गुणवत्ता बढ़ाते हैं।
  • विरोधाभासी विचार लेखन की कमजोरी को दर्शाते हैं।
  • लेखक को अपने विचारों की जांच कर उन्हें सुसंगत बनाना चाहिए।
  • सुसंबद्धता बनाए रखने के लिए लेखन की रूपरेखा बनाना सहायक होता है।

पाठ्य प्रमाण / उदाहरण

मौसम की चर्चा करते हुए अचानक राजनीति पर आ जाना बिना किसी तार्किक संबंध के सुसंबद्धता की कमी है। इसी तरह मौसम के बारे में विरोधाभासी बातें करना असंगति है।

हल किए गए उदाहरण

यदि कोई लेखक मौसम के बारे में एक बार उसे खुशगवार बताता है और दूसरी बार उबाऊ, तो यह असंगति है। इसे सुधारने के लिए लेखक को अपने विचारों को स्पष्ट और सुसंगत बनाना होगा।

अभ्यास प्रश्न

  • स्तर 1 – सरल: सुसंबद्धता और सुसंगति का अर्थ लिखिए।
  • स्तर 2 – मध्यम: लेखन में सुसंबद्धता क्यों आवश्यक है? समझाइए।
  • स्तर 3 – कठिन: दिए गए उदाहरण में सुसंबद्धता की कमी को पहचानिए और सुधार के उपाय बताइए।

उत्तर कुंजी

  • सुसंबद्धता का अर्थ है विचारों का आपस में जुड़ा होना।
  • सुसंगति का अर्थ है विचारों का मेल खाना।
  • सुसंबद्धता लेखन को स्पष्ट और प्रभावी बनाती है।
  • सुधार के लिए लेखन की रूपरेखा बनाना और विचारों को क्रमबद्ध करना आवश्यक है।

त्वरित संदर्भ

  • लेखन में विरोधाभास से बचें।
  • विचारों को तार्किक क्रम में रखें।

शब्दावली

  • विरोधाभास: दो या अधिक विचारों का एक-दूसरे के विपरीत होना।
  • रूपरेखा: लेखन की योजना या ढांचा।

लेखन के प्रारंभिक सुझाव

अप्रत्याशित विषयों पर लेखन करते समय कुछ सुझावों का पालन करना लेखन को सरल और प्रभावी बनाता है। विषय की खुली प्रकृति को समझते हुए, लेखक को अपने विचारों को स्वतंत्र रूप से व्यक्त करना चाहिए, साथ ही लेखन में सुसंबद्धता और सुसंगति बनाए रखनी चाहिए।

मुख्य बिंदु

  • विषय को खुले मैदान की तरह समझें जहाँ विचारों की स्वतंत्रता हो।
  • विचारों को चुनकर विस्तार से लिखें।
  • आकर्षक और निर्वाह-योग्य शुरुआत करें।
  • लेखन की रूपरेखा बनाएं ताकि विचार सुसंगत रहें।
  • विरोधाभासी विचारों से बचें।

पाठ्य प्रमाण / उदाहरण

लेख में बताया गया है कि विषय के दो खंभों के बीच बँधी रस्सी की तरह नहीं, बल्कि खुले मैदान की तरह होना चाहिए, जहाँ लेखक को अपनी सोच व्यक्त करने की छूट हो।

हल किए गए उदाहरण

लेखक को दो-तीन मिनट ठहर कर यह तय करना चाहिए कि कौन से विचारों को विस्तार देना है और किस प्रकार की शुरुआत करनी है।

अभ्यास प्रश्न

  • स्तर 1 – सरल: अप्रत्याशित विषयों पर लेखन के लिए क्या सुझाव दिए गए हैं? लिखिए।
  • स्तर 2 – मध्यम: लेखन की शुरुआत कैसे करनी चाहिए? समझाइए।
  • स्तर 3 – कठिन: लेखन में सुसंबद्धता बनाए रखने के उपाय बताइए।

उत्तर कुंजी

  • विचारों की स्वतंत्रता को स्वीकार करें।
  • आकर्षक और निर्वाह-योग्य शुरुआत करें।
  • रूपरेखा बनाकर विचारों को क्रमबद्ध करें।
  • विरोधाभासी विचारों से बचें।

त्वरित संदर्भ

  • लेखन में योजना बनाना आवश्यक है।
  • विचारों को स्पष्ट और सुसंगत रखें।

शब्दावली

  • निर्वाह-योग्य: ऐसा जो आगे बढ़ाने योग्य हो।
  • आकर्षक शुरुआत: पाठक का ध्यान आकर्षित करने वाली शुरुआत।

लेखन के नमूने और विभिन्न दृष्टिकोण

इस भाग में दीवाल घड़ी विषय पर तीन विभिन्न प्रकार के लेखन नमूने प्रस्तुत किए गए हैं, जो स्मृति-आधारित, दार्शनिक और अवलोकन-आधारित दृष्टिकोण को दर्शाते हैं। इसके अतिरिक्त जातिवाद के विषय पर एक विश्लेषणात्मक लेख भी शामिल है।

मुख्य बिंदु

  • स्मृति-आधारित लेखन में लेखक अपनी यादों को क्रमबद्ध करता है।
  • दार्शनिक लेखन में गहरे विचार और प्रश्न उठाए जाते हैं।
  • अवलोकन-आधारित लेखन में वस्तुओं और घटनाओं का विवरण और टिप्पणी होती है।
  • विश्लेषणात्मक लेखन में सामाजिक या अन्य विषयों पर तर्क और विचार प्रस्तुत किए जाते हैं।

पाठ्य प्रमाण / उदाहरण

दीवाल घड़ी के तीनों नमूने और जातिवाद का ज़हर विषय पर लेखन इस बात को स्पष्ट करते हैं कि लेखन के विभिन्न दृष्टिकोण और शैलियाँ हो सकती हैं।

हल किए गए उदाहरण

पहला नमूना स्मृति-आधारित है, जिसमें लेखक ने दीवाल घड़ी से जुड़ी यादों को प्रस्तुत किया है। दूसरा नमूना दार्शनिक है, जो समय और जीवन के गहरे अर्थों पर विचार करता है। तीसरा नमूना अवलोकन-आधारित है, जिसमें घड़ी की सुंदरता और उसकी उपस्थिति का वर्णन है। जातिवाद पर लेखन सामाजिक समस्या का विश्लेषण करता है।

अभ्यास प्रश्न

  • स्तर 1 – सरल: दीवाल घड़ी के किसी एक नमूने का संक्षिप्त सार लिखिए।
  • स्तर 2 – मध्यम: दार्शनिक दृष्टिकोण से दीवाल घड़ी के लेखन की विशेषताएँ बताइए।
  • स्तर 3 – कठिन: जातिवाद के विषय पर प्रस्तुत लेख का विश्लेषण कीजिए।

उत्तर कुंजी

  • स्मृति-आधारित लेखन में लेखक की व्यक्तिगत यादें और अनुभव प्रमुख होते हैं।
  • दार्शनिक लेखन में गहरे और व्यापक विचार प्रस्तुत किए जाते हैं।
  • जातिवाद पर लेखन में सामाजिक तथ्य, समस्या और समाधान पर विचार किया जाता है।

त्वरित संदर्भ

  • लेखन के विभिन्न दृष्टिकोणों को समझें।
  • लेखन में विषय के अनुसार शैली का चयन करें।

शब्दावली

  • स्मृति-आधारित: यादों पर आधारित।
  • दार्शनिक: गहरे विचारों वाला।
  • अवलोकन-आधारित: निरीक्षण पर आधारित।
  • विश्लेषणात्मक: तर्क और विवेचना पर आधारित।

HINDI — ALL CHAPTERS

1

जनसंचार माध्यम

1

विभिन्न माध्यमों के लिए लेखन

2

पत्रकारिता के विविध आयाम

2

पत्रकारीय लेखन के विभिन्न रूप और लेखन प्रक्रिया

3

डायरी लिखने की कला

3

विशेष लेखन— स्वरूप और प्रकार

4

कथा-पटकथा

4

कैसे बनती है कविता

5

नाटक लिखने का व्याकरण

5

कार्यालयी लेखन और प्रक्रिया

6

कैसे लिखें कहानी

6

स्ववृत्त(बायोडाटा) लेखन और रोज़गार संबंधी आवेदन पत्र

7

कैसे करें कहानी का नाट्य रूपांतरण

7

कोश-एक परिचय

8

कैसे बनता है रेडियो नाटक

9

नए और अप्रत्याशित विषयों पर लेखन

1

आत्मपरिचय

2

एक गीत

3

पतंग

4

कविता के बहाने

5

बात सीधी थी पर

6

कैमरे में बंद अपाहिज

7

उषा

8

बादल राग

9

कवितावली (उत्तर कांड से)

10

लक्ष्मण-मूर्च्छा और राम का विलाप

11

रुबाइयाँ

12

छोटा मेरा खेत

13

बगुलों के पंख

14

भक्तिन

15

बाज़ार दर्शन

16

काले मेघा पानी दे

17

पहलवान की ढोलक

18

शिरीष के फूल

19

श्रम विभाजन और जाति-प्रथा

20

मेरी कल्पना का आदर्श-समाज

1

सिल्वर वैडिंग

2

जूझ

3

अतीत में दबे पाँव