CLASS 11-PCM . HINDI . वितान . राजस्थान की-रजत-बूँदें
Chapter 2 : राजस्थान की रजत बूँदें
Ch 2
HINDI
CLASS 11-PCM
अनुपम मिश्र का परिचय
अनुपम मिश्र (सन् 1948-2016) का जन्म वर्धा, महाराष्ट्र में हुआ था। वे पर्यावरण संबंधी मुद्दों पर बीस पुस्तकों के लेखक थे, जिनमें "आज भी खरे हैं तालाब" और "राजस्थान की रजत बूँदें" विशेष रूप से चर्चित हैं। वे पर्यावरण आंदोलनों से घनिष्ठ रूप से जुड़े रहे और लोगों को जागरूक करने के लिए मुहिम भी चलाते रहे। सन् 1977 से वे गांधी शांति प्रतिष्ठान के पर्यावरण कक्ष से जुड़े थे।
राजस्थान की रजत बूँदें का सारांश
यह गद्यांश राजस्थान के मरुभूमि क्षेत्र में कुंइयों की विशेष कला और उनके महत्व का वर्णन करता है। पसीने में तरबतर चेलवांजी कुंई के भीतर गहरी खुदाई कर रहे हैं। कुंई का व्यास संकरा होता है, इसलिए खुदाई के लिए विशेष औजार और तकनीक का उपयोग होता है। कुंई वर्षा जल को एक विशेष प्रकार से समेटती है, जो भूजल से अलग होता है। मरुभूमि में रेत के नीचे खड़िया पत्थर की एक पट्टी होती है जो वर्षा जल को गहरे खारे भूजल से मिलने से रोकती है। इस कारण बरसात का पानी रेत में बूँद-बूँद समा जाता है और कुंई में मीठा पानी जमा होता है। कुंई बनाने की कला में चेजारो नामक कुशल लोग होते हैं जो खुदाई और चिनाई का काम करते हैं। कुंई का मुँह छोटा रखने के कई कारण हैं, जैसे पानी की बूँदों का धीरे-धीरे रिसना और पानी का भाप बनकर उड़ने से बचाव। कुंई को ढककर रखना आवश्यक होता है ताकि पानी साफ़ और सुरक्षित रहे। कुंई से पानी निकालने के लिए घिरनी या चकरी का उपयोग किया जाता है। कुंई की सफलता पर गाँव में उत्सव होता है और चेजारो को सम्मानित किया जाता है। कुंई निजी संपत्ति होते हुए भी सार्वजनिक भूमि पर बनती हैं और समाज इसका नियंत्रण रखता है।
कुंई बनाने की प्रक्रिया और विशेषताएँ
कुंई की खुदाई में कुल्हाड़ी या फावड़े की जगह बसौली नामक छोटे औजार का उपयोग होता है। गरमी कम करने के लिए ऊपर से रेत नीचे फेंकी जाती है जिससे ताजी हवा आती है। चेलवांजी अपने सिर पर धातु का बर्तन टोप की तरह पहनते हैं ताकि रेत के कण सिर पर न लगें। कुंई की गहराई में मिट्टी की चिनाई (चेजा) की जाती है ताकि मिट्टी भसके नहीं। कुछ जगहों पर रस्से से कुंई को बाँधा जाता है, जिसमें खींप नामक घास से रस्सी बनाई जाती है। लकड़ी के लट्ठों से भी चिनाई की जाती है। कुंई की गहराई बढ़ने पर गरमी और दमघोंटू हवा होती है, इसलिए ऊपर से रेत फेंककर हवा का संचार किया जाता है। कुंई के मुँह को लकड़ी या घास-फूस से ढककर पानी की सुरक्षा की जाती है। कुंई से पानी निकालने के लिए घिरनी या चकरी लगाई जाती है जो पानी निकालने में सहायक होती है।
पानी के रूप और मरुभूमि में पानी का संचय
मरुभूमि में पानी तीन रूपों में पाया जाता है: पालरपानी (सतही जल), पातालपानी (भूजल) और रेजाणीपानी (धरातल के नीचे समाया वर्षा जल)। खड़िया पत्थर की पट्टी वर्षा जल को गहरे खारे भूजल से मिलने से रोकती है, जिससे रेत में नमी बनी रहती है। रेत के कण बारीक और अलगाव वाले होते हैं, इसलिए मरुभूमि में दरारें नहीं पड़तीं और नमी धरती में बनी रहती है। कुंई इस नमी को बूँद-बूँद इकट्ठा कर मीठा पानी प्रदान करती है। कुंई का व्यास छोटा होता है ताकि पानी धीरे-धीरे रिसे और भाप न बने।
सामाजिक और सांस्कृतिक महत्व
कुंई की सफलता पर गाँव में उत्सव होता है और चेजारो को सम्मानित किया जाता है। चेजारो के साथ गाँव का संबंध वर्ष भर बना रहता है। कुंई निजी संपत्ति होते हुए भी सार्वजनिक भूमि पर बनती हैं और समाज इसका नियंत्रण रखता है। नई कुंई बनाने के लिए समाज की स्वीकृति आवश्यक होती है। कुंई से दिन में दो-तीन घड़े मीठा पानी निकाला जा सकता है, इसलिए पूरा गाँव गोधूलि बेला में कुंइयों पर आता है। कुंई के ढक्कन पर ताले भी लगते हैं ताकि पानी की सुरक्षा हो सके।
शब्दावली
- चेलवांजी: कुंई की खुदाई और चिनाई करने वाले दक्षतम लोग।
- चेजा: कुंई की चिनाई का विशेष काम।
- बसौली: छोटा फावड़ा जैसा औजार।
- खींप: रस्सी बनाने वाली घास।
- खड़िया पत्थर: मरुभूमि में रेत के नीचे पत्थर की एक पट्टी।
- पालरपानी: सीधे बरसात से मिलने वाला सतही जल।
- पातालपानी: भूजल जो कुओं में से निकाला जाता है।
- रेजाणीपानी: धरातल के नीचे समाया वर्षा जल।
- घिरनी/चकरी: कुंई से पानी निकालने का उपकरण।
- ओड़ाक: पानी निकालने के लिए उपयोग में आने वाला तना।
- अरणी, बण, बावल, कुंबट: लकड़ी के पेड़ों के नाम जिनकी लकड़ी से लट्ठे बनाए जाते हैं।
- आच प्रथा: कुंई खोदने वालों को वर्ष भर सम्मानित करने की प्रथा।
अभ्यास प्रश्न
स्तर 1 – सरल
- चेलवांजी कौन होते हैं और उनका कार्य क्या है?
- कुंई का मुँह छोटा रखने के कारण क्या हैं?
- रेजाणीपानी क्या है?
स्तर 2 – मध्यम
- राजस्थान की मरुभूमि में कुंई बनाने की प्रक्रिया का वर्णन करें।
- खड़िया पत्थर की पट्टी का पानी के संचय में क्या महत्व है?
- कुंई की सुरक्षा के लिए किन उपायों का उपयोग किया जाता है?
स्तर 3 – कठिन
- राजस्थान की रजत बूँदें पाठ में वर्णित कुंई की कला और उसके सामाजिक-सांस्कृतिक महत्व पर विस्तार से चर्चा करें।
- पानी के तीन रूपों पालरपानी, पातालपानी और रेजाणीपानी की विशेषताओं की तुलना करें।
- चेजारो की भूमिका और कुंई की चिनाई की प्रक्रिया का विश्लेषण करें।
उत्तर कुंजी
स्तर 1 – सरल
- चेलवांजी: कुंई की खुदाई और चिनाई करने वाले दक्षतम लोग होते हैं। वे कुंई के भीतर मिट्टी खोदते हैं और चिनाई करते हैं।
- कुंई का मुँह छोटा रखने के कारण: पानी की बूँदें धीरे-धीरे रिसती हैं, पानी का भाप बनकर उड़ने से बचाव होता है, और पानी को ऊपर निकालना आसान होता है।
- रेजाणीपानी: धरातल के नीचे समाया वर्षा जल जो भूजल से अलग होता है और खड़िया पत्थर की पट्टी के कारण पातालपानी से अलग रहता है।
स्तर 2 – मध्यम
- कुंई बनाने की प्रक्रिया में बसौली से खुदाई, रेत फेंककर हवा का संचार, चेलवांजी द्वारा चिनाई, रस्से या लकड़ी से कुंई का बाँधना शामिल है।
- खड़िया पत्थर की पट्टी वर्षा जल को गहरे खारे भूजल से मिलने से रोकती है, जिससे रेत में नमी बनी रहती है और कुंई में मीठा पानी जमा होता है।
- कुंई को लकड़ी या घास-फूस से ढककर रखा जाता है, ताले लगाए जाते हैं, और पानी निकालने के लिए घिरनी या चकरी का उपयोग किया जाता है।
स्तर 3 – कठिन
- कुंई की कला राजस्थान की मरुभूमि में पानी की कमी को पूरा करने वाली विशिष्ट तकनीक है। चेजारो कुशल लोग होते हैं जो खुदाई और चिनाई करते हैं। कुंई सामाजिक संपत्ति होते हुए भी निजी उपयोग के लिए होती है। कुंई की सफलता पर गाँव में उत्सव होता है और चेजारो को सम्मानित किया जाता है।
- पालरपानी सतही जल है, पातालपानी भूजल है, और रेजाणीपानी धरातल के नीचे समाया वर्षा जल है। रेजाणीपानी खड़िया पत्थर की पट्टी के कारण पातालपानी से अलग रहता है।
- चेजारो मिट्टी की चिनाई करते हैं ताकि कुंई भसके नहीं। वे रस्से या लकड़ी से कुंई को बाँधते हैं। चिनाई में सावधानी आवश्यक होती है क्योंकि छोटी गलती से कुंई गिर सकती है।
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