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मेरे-तो-गिरधर-गोपाल-दूसरो-न-कोई

CLASS 11-PCM . HINDI . आरोह . मेरे तो-गिरधर-गोपाल-दूसरो-न-कोई

Chapter 10 : मेरे तो गिरधर गोपाल, दूसरो न कोई

Ch 10

HINDI

CLASS 11-PCM

मीरा का जीवन परिचय

मीरा का जन्म सन् 1498 में मारवाड़ रियासत के कुड़की गाँव में हुआ था। वे एक महान भक्त कवयित्री थीं, जिन्होंने अपने जीवन को भगवान कृष्ण की भक्ति में समर्पित कर दिया। बचपन से ही उनके मन में कृष्ण के प्रति गहरा प्रेम और भक्ति थी, जिसे वे अपने आराध्य और पति के रूप में मानती थीं। मीरा सगुण भक्ति की प्रमुख कवयित्री थीं, परंतु उनकी रचनाओं में निर्गुण भक्ति का भी प्रभाव देखा जा सकता है। संत रैदास को वे अपना गुरु मानती थीं।

मीरा ने अपने जीवन में अनेक कठिनाइयाँ झेलीं, परंतु उन्होंने कभी भी अपने भक्ति मार्ग से विचलन नहीं किया। उन्होंने सामाजिक बंधनों और लोकलाज का विरोध किया। पर्दा प्रथा का पालन नहीं किया और मंदिरों में खुले मन से नृत्य और भजन किया। वे मानती थीं कि सत्संग से ज्ञान प्राप्त होता है और ज्ञान से मुक्ति मिलती है। जीवन के अंतिम दिनों में वे द्वारका गईं और माना जाता है कि वे रणछोड़ दास जी के मंदिर की मूर्ति में समाहित हो गईं।

मीरा की कविता विशेषताएँ

मीरा की कविताओं में प्रेम की गहरी अभिव्यक्ति मिलती है। उनकी कविता में विरह की वेदना और मिलन का उल्लास दोनों समाहित हैं। उनकी भाषा सरल और सादगीपूर्ण है, जो उनकी कविता की सबसे बड़ी खूबी है। उन्होंने मुक्तक गेय पदों की रचना की, जो लोक और शास्त्रीय संगीत दोनों में लोकप्रिय हैं। उनकी भाषा मुख्यतः राजस्थानी है, जिसमें ब्रज भाषा का भी प्रभाव है।

मीरा की कविता में सूफियों के प्रभाव के भी संकेत मिलते हैं। उनकी कविताओं में दर्द और वेदना की गहराई है, जिसमें वे बार-बार कहती हैं कि कोई उनके दर्द को नहीं समझता, न शत्रु न मित्र।

मीरा की प्रमुख रचनाएँ और प्रसिद्ध पद

मीरा की प्रमुख रचनाएँ हैं - मीरा पदावली और नरसीजी-नो-माहेरो। यहाँ प्रस्तुत पद मीराँ मुक्तावली से लिया गया है, जिसे नरोत्तम दास स्वामी ने संकलित और संपादित किया था।

पद 1:

मेरे तो गिरधर गोपाल, दूसरो न कोई।
जा के सिर मोर-मुकुट, मेरो पति सोई।
छाँड़ि दयी कुल की कानि, कहा करिहै कोई?
संतन ढिग बैठि-बैठि, लोक-लाज खोयी।
अँसुवन जल सींचि-सींचि, प्रेम-बेलि बोयी।
अब त बेलि फैलि गयी, आणंद-फल होयी।
दूध की मथनियाँ बड़े प्रेम से विलोयी।
दधि मथि घृत काढ़ि लियो, डारि दयी छोयी।
भगत देखि राजी हुयी, जगत देखि रोयी।
दासि मीरा लाल गिरधर! तारो अब मोही।

शब्दावली और व्याख्या

  • कानि - मर्यादा
  • ढिग - साथ
  • बेलि - प्रेम की बेल
  • विलोयी - मथी
  • छोयी - छाछ, सारहीन अंश

सारांश और केंद्रीय भाव

इस पद में मीरा ने अपने प्रेमी गिरधर गोपाल (कृष्ण) के प्रति अपनी अनन्यता और गहरा प्रेम व्यक्त किया है। वे कहती हैं कि उनका कोई दूसरा पति नहीं है। उन्होंने अपने कुल की मर्यादा और लोकलाज को त्याग दिया है क्योंकि उनका प्रेम कृष्ण के लिए सर्वोपरि है। वे अपने प्रेम को प्रेम-बेल के रूप में व्यक्त करती हैं, जिसे उन्होंने अपने आंसुओं से सींचा है। इस प्रेम का फल आनंदमय है। मीरा की यह कविता भक्ति और प्रेम की गहराई को दर्शाती है।

मीरा की भक्ति और समाज से संबंध

मीरा ने अपने समय के सामाजिक बंधनों और मर्यादाओं का विरोध किया। उन्होंने पर्दा प्रथा का पालन नहीं किया और खुले मन से भक्ति की। वे मानती थीं कि सत्संग से ज्ञान और मुक्ति मिलती है। उनकी भक्ति में स्त्री मुक्ति की भावना भी झलकती है, क्योंकि उन्होंने समाज के दबावों को चुनौती दी। उनकी भक्ति न केवल कृष्ण के प्रति प्रेम है, बल्कि सामाजिक बंधनों से मुक्त होने की भी अभिव्यक्ति है।

अभ्यास प्रश्न

स्तर 1 – सरल

  • मीरा का जन्म कहाँ हुआ था?
  • मीरा किस देवता की उपासिका थीं?
  • मीरा ने किस संत को अपना गुरु माना?

स्तर 2 – मध्यम

  • मीरा की कविता की भाषा और शैली के बारे में बताइए।
  • मीरा ने सामाजिक बंधनों के प्रति क्या दृष्टिकोण रखा?
  • पद 1 में "प्रेम-बेलि" का क्या अर्थ है?

स्तर 3 – कठिन

  • मीरा की भक्ति और समाज के प्रति उनके दृष्टिकोण का विश्लेषण कीजिए।
  • पद 1 के माध्यम से मीरा के प्रेम और भक्ति की गहराई को समझाइए।
  • मीरा की कविता में सूफियों के प्रभाव को कैसे देखा जा सकता है?

उत्तर कुंजी

स्तर 1 – सरल

  • मीरा का जन्म सन् 1498 में कुड़की गाँव (मारवाड़ रियासत) में हुआ था।
  • मीरा कृष्ण की उपासिका थीं।
  • मीरा ने संत रैदास को अपना गुरु माना।

स्तर 2 – मध्यम

  • मीरा की कविता सरल और सादगीपूर्ण भाषा में है, जिसमें राजस्थानी और ब्रज भाषा का मिश्रण है। उनकी कविता में प्रेम, विरह और भक्ति की भावनाएँ स्पष्ट रूप से व्यक्त होती हैं।
  • मीरा ने सामाजिक बंधनों और लोकलाज का विरोध किया। उन्होंने पर्दा प्रथा का पालन नहीं किया और खुले मन से भक्ति की।
  • "प्रेम-बेलि" का अर्थ है प्रेम की बेल, जिसे मीरा ने अपने आंसुओं से सींचा है, जो उनके प्रेम की गहराई को दर्शाता है।

स्तर 3 – कठिन

  • मीरा की भक्ति में सामाजिक बंधनों को तोड़ने की शक्ति है। वे स्त्री मुक्ति की प्रतीक हैं जिन्होंने समाज के दबावों को चुनौती दी। उनकी भक्ति केवल कृष्ण के प्रति प्रेम नहीं, बल्कि सामाजिक स्वतंत्रता की अभिव्यक्ति भी है।
  • पद 1 में मीरा ने अपने प्रेमी गिरधर गोपाल के प्रति अपनी अनन्यता और गहरा प्रेम व्यक्त किया है। उन्होंने अपने कुल की मर्यादा और लोकलाज को त्याग दिया है। प्रेम-बेलि के माध्यम से उन्होंने अपने प्रेम की गहराई को दर्शाया है।
  • मीरा की कविता में सूफियों के प्रभाव को उनके प्रेम की गहराई, दर्द और वेदना के माध्यम से देखा जा सकता है। वे प्रेम को एक आध्यात्मिक अनुभव के रूप में प्रस्तुत करती हैं।

त्वरित संदर्भ

  • मीरा: 1498 में जन्मी भक्त कवयित्री।
  • प्रमुख रचनाएँ: मीरा पदावली, नरसीजी-नो-माहेरो।
  • भक्ति शैली: सगुण भक्ति मुख्य, निर्गुण भक्ति का प्रभाव।
  • भाषा: राजस्थानी और ब्रज भाषा का मिश्रण।
  • कविता की विशेषता: सरलता, सादगी, प्रेम और विरह की अभिव्यक्ति।
  • सामाजिक दृष्टिकोण: सामाजिक बंधनों का विरोध, स्त्री मुक्ति की भावना।

शब्दावली

  • कानि - मर्यादा
  • ढिग - साथ
  • बेलि - प्रेम की बेल
  • विलोयी - मथी
  • छोयी - छाछ, सारहीन अंश

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