भारतीय कलाएँ का परिचय
भारतीय कलाएँ हमारे जीवन का अभिन्न हिस्सा हैं, जिनके माध्यम से हम अपने परिवेश, प्रकृति, भावों और विचारों को अभिव्यक्त करते हैं। चित्रकारी, संगीत, नृत्य आदि कलाओं के माध्यम से मनुष्य ने सदियों से अपनी भावनाओं और अनुभवों को व्यक्त किया है। ये कलाएँ न केवल मनोरंजन का साधन हैं, बल्कि वे हमारे सांस्कृतिक और सामाजिक जीवन से गहराई से जुड़ी हुई हैं।
मुख्य बिंदु
- कलाओं की अपनी भाषा होती है।
- कलाएँ प्रकृति, जीवन और उत्सवों से जुड़ी हैं।
- लोक और शास्त्रीय कलाओं का विकास हुआ।
- भारतीय कलाओं में विविधता और सांस्कृतिक समृद्धि है।
पाठ्य प्रमाण
"समुद्र में उठती गिरती लहरों को देखकर चित्रकार उसे रंगों से सजाता है। चिड़ियाँ की चहचहाहट को गायक स्वरों में सजाता है तो नर्तक मन के भावों को विभिन्न मुद्राओं में सजाता है।"
अभ्यास प्रश्न
- सरल: भारतीय कलाओं का हमारे जीवन में क्या महत्व है?
- मध्यम: लोक और शास्त्रीय कलाओं में क्या अंतर है?
- कठिन: भारतीय कलाओं का सांस्कृतिक और सामाजिक जीवन में क्या योगदान है?
उत्तर कुंजी
भारतीय कलाएँ हमारे जीवन के विभिन्न पहलुओं को अभिव्यक्त करती हैं। लोक कलाएँ जनसमूह से जुड़ी होती हैं जबकि शास्त्रीय कलाएँ नियमों और शासकों के संरक्षण में विकसित हुईं। ये कलाएँ हमारी सांस्कृतिक विरासत को संरक्षित करती हैं और सामाजिक एकता को बढ़ावा देती हैं।
शब्दावली
- लोक कला: जनसमूह की कला जो आम लोगों से जुड़ी होती है।
- शास्त्रीय कला: नियमों और परंपराओं के अनुसार विकसित कला।
- अलंकार: काव्य या कला में साज-सज्जा।
चित्रकला
चित्रकला प्राचीन काल से हमारे जीवन का अभिन्न अंग रही है। प्रारंभ में भाषा न होने के कारण मनुष्य ने अपने विचारों और भावों को चित्रों के माध्यम से व्यक्त किया। शैल चित्र, गुफ़ा चित्र जैसे प्राचीन चित्रकला के उदाहरण हैं। गुप्त साम्राज्य के काल में चित्रकला का स्वर्ण युग माना जाता है। अजंता, एलोरा, भीमबेटका की गुफाएँ इसके प्रमुख उदाहरण हैं।
सबसे प्राचीन चित्रों के नमूने शैल चित्रों को ही माना जाता है। ये चट्टानों पर प्राकृतिक रंगों से बने हुए चित्र हैं। ये गुफ़ाओं में मिलते हैं। मध्य प्रदेश में भीम बेटका की गुफ़ाएँ शैल चित्रों के लिए जानी जाती हैं। इन चित्रों में जीवन की रोज़मर्रा की गतिविधियाँ शिकार, नृत्य, संगीत, जानवर, युद्ध, साज-सज्जा सभी कुछ दिखाई पड़ता है। गुफ़ाओं में कला सृजन की अति प्राचीन परंपरा रही है। एलोरा और अजंता की गुफ़ाएँ कला कृतियों के लिए विख्यात हैं।
चौथी से छठी सदी के बीच गुप्त साम्राज्य कलाओं के लिए स्वर्ण युग कहलाता है। अजंता की गुफ़ाएँ उन्हीं दिनों खोदी गयीं। उनकी दीवारों पर चित्र बनाए गए। बाग और बादामी की गुफ़ाएँ भी इसी ज़माने की हैं। अजंता की गुफ़ाओं के चित्र इतने आकर्षक हैं कि वे आज तक के कलाकारों पर गहरा असर डालते हैं। ऐसा मानना है कि अजंता के दीवारों पर बने चित्रों को बौद्ध भिक्खुओं ने बनाया है।
सातवीं-आठवीं सदी में चट्टानों को काटकर एलोरा की गुफ़ाएँ तैयार की गईं। इसकी सबसे बड़ी विशेषता है कि इन्हीं के बीच कैलाश का बहुत विशाल मंदिर है। इन मानुषी कला सृजन को देखकर आश्चर्य होता है। उन दिनों मनुष्य ने इसकी कल्पना कैसे की होगी और फिर उस कल्पना को साकार करने के लिए कितना परिश्रम किया होगा! लगभग इसी समय निर्मित एलीफैंटा की गुफ़ाएँ भी मिलती हैं। यहाँ त्रिमूर्ति की ज़बरदस्त मूर्ति है। दक्षिण भारत के महाबलिपुरम की विशाल मूर्ति कला और तंजौर की चित्रकला, कला कौशल के अद्भुत उदाहरण हैं।
हम जिसे लघुचित्र के नाम से जानते हैं, वे दो प्रकार के हैं। एक-स्थायी जो कपड़ों, किताबों, लकड़ी या कागज़ पर किया जाता है। इनमें आंध्रप्रदेश और छत्तीसगढ़ की कलमकारी, पंजाब की फुलकारी, महाराष्ट्र की वरली इत्यादि बहुत प्रसिद्ध रहे हैं। इनमें प्रयोग होने वाली सभी सामग्री प्राकृतिक ही होती हैं।
इन चित्रों की विशेषता है इनकी विभिन्न प्रकार की शैलियाँ। वनों-गाँवों के लोग अपनी-अपनी पारंपरिक शैलियों में चित्रकारी करते हैं। राजस्थान के चित्तौढ़गढ़ में कलाकार लकड़ी के मंदिरों पर चित्रकारी करते थे। इसे किवाड़ पेंटिंग भी कहते हैं। इस चित्रकारी में चित्र के माध्यम से सांस्कृतिक और ऐतिहासिक कथाओं को अभिव्यक्त किया जाता है।
उड़ीसा के पटचित्र कथा में कवि जयदेव के गीतगोविंद को भी उकेरा गया है। इसे कागज़ या पत्तों पर गहरे लाल, काले, नीले रंगों से उकेरते हैं। देखने की बात है कि गीतगोविंद के पदों को नर्तक ओड़िशी नृत्य के माध्यम से भी अभिव्यक्त करते हैं। सभी कलाएँ एक दूसरे से जुड़ी हुई हैं।
मिथिला की चित्रकारी में मधुबनी चित्रकला भी बहुत प्रसिद्ध है। आज भी कलाकार अपनी इस कला को ज़िंदा रखे हुए हैं। आज के राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय बाज़ार में भी इन लघु लोक कलाओं की बहुत मांग है।
अस्थायी कलाओं में कोहबर, ऐपण, अल्पना, रंगोली जैसी कलाएँ काफ़ी प्रचलित हैं। इन कलाओं का संबंध शादी-त्योहार और उत्सवों से है। इन्हें क्षेत्रीय भाषाओं में अलग-अलग नाम से जाना जाता है।
वास्तव में उत्तराखंड में जिसे ऐपण कहते हैं उसे ही राजस्थान में मंडवा, गुजरात में सत्तिया, महाराष्ट्र में रंगोली, बिहार में अरिपन, मध्यप्रदेश और उत्तरप्रदेश में चौकपूरना, दक्षिण भारत में कोलम के नाम से जाना जाता है। ये सभी किसी विशेष मांगलिक अवसरों पर बनाए जाते हैं। कलाओं का यह अद्भुत संसार हमारी संस्कृति की पहचान है, पर हम यह भी जानते हैं कि हिंदुस्तानी कला जितनी हिंदुस्तान में दिखाई पड़ती है, इससे कहीं अधिक उसके बाहर भी है। यह ध्यान देने की बात है कि यहाँ की कला अन्य देशों में किस प्रकार विकसित और सुरक्षित है। वास्तव में "हिंदुस्तान के अंदर की ही हिंदुस्तानी कला को जानना उसकी आधी ही कहानी जानने के बराबर है। उसे पूरी तौर पर समझने के लिए हमें बौद्ध-धर्म के साथ-साथ मध्य-एशिया, चीन और जापान तक जाना चाहिए; तिब्बत और बर्मा और स्याम में फैलकर नये रूप धारण करते हुए और फुटकर नये सौंदर्य पेश करते हुए हमें इसे देखना चाहिए; हमें कंबोडिया और जावा में इसके शानदार और बेमिसाल कारनामों को देखना चाहिए।"¹
यह सच है कि भारतीय कलाओं का विस्तार विश्व के अन्य भू-भागों में भी हुआ, लेकिन उन कलाकृतियों के सृजन मे क्षेत्रीय विशेषताएँ हैं। गांधार शैली में बनी बुद्ध की प्रतिमा और तिब्बत की शैली में बनी बुद्ध प्रतिमा में अपनी-अपनी क्षेत्रीय पहचान स्पष्ट दिखाई देती है।
संगीत कला
भारतीय संगीत कला का इतिहास वैदिक काल से शुरू होता है। संगीत दो प्रकार का था - मार्गी और देसी। मार्गी संगीत धार्मिक था और नियमबद्ध था, जबकि देसी संगीत लोक से जुड़ा था। भारतीय संगीत सुर, ताल, राग और काल से जुड़ा है। विभिन्न समयों के अनुसार रागों का प्रयोग होता है। वीणा मुख्य वाद्ययंत्र रही है। संगीत में लोक और शास्त्रीय दोनों प्रकार की परंपराएँ हैं।
मुख्य बिंदु
- वैदिक काल में संगीत का प्रारंभ।
- मार्गी और देसी संगीत का भेद।
- सुर, ताल, राग और काल का महत्व।
- वीणा प्रमुख वाद्ययंत्र।
- लोक संगीत में संस्कारगीत, ऋतुगीत शामिल।
पाठ्य प्रमाण
"साहित्यसंगीतकलाविहीनः, साक्षात्पशुः पुच्छविषाणहीनः" - भर्तृहरि
अभ्यास प्रश्न
- सरल: मार्गी और देसी संगीत में क्या अंतर है?
- मध्यम: भारतीय संगीत में राग और ताल का क्या महत्व है?
- कठिन: भारतीय संगीत की लोक और शास्त्रीय परंपराओं पर चर्चा करें।
उत्तर कुंजी
मार्गी संगीत धार्मिक और नियमबद्ध होता है, जबकि देसी संगीत लोक से जुड़ा होता है। राग और ताल संगीत की आत्मा हैं जो समय और भाव के अनुसार संगीत को परिभाषित करते हैं। लोक और शास्त्रीय संगीत दोनों भारतीय संगीत की समृद्ध परंपराएँ हैं।
शब्दावली
- राग: संगीत की धुन जो भाव व्यक्त करती है।
- ताल: संगीत की लय।
- वीणा: प्रमुख भारतीय वाद्ययंत्र।
नृत्य कला
भारतीय नृत्य कला का आधार अभिनय है, जिसका शास्त्रीय स्वरूप भरतमुनि के नाट्यशास्त्र में मिलता है। नृत्य में भाव और भंगिमा का विशेष महत्व है। भारत में लोक नृत्यों की विविधता है, जो जीवन के विभिन्न अनुष्ठानों और ऋतुओं से जुड़ी हैं। शास्त्रीय नृत्य जैसे कथक, भरतनाट्यम, ओड़िशी आदि प्रसिद्ध हैं। नृत्य में हाथों की मुद्राएँ भावों को व्यक्त करती हैं।
भरतमुनि का नाट्यशास्त्र नृत्य का आधार है। नृत्य में अभिनय, भाव और भंगिमा का समावेश होता है। नर्त्य का अर्थ अभिनय है जिसमें शब्द और भंगिमा महत्वपूर्ण होते हैं, जबकि नृत्य में भाव और भंगिमा का विशेष महत्व होता है।
भारत में लोक नृत्यों की विविधता है जो जीवन के विभिन्न अनुष्ठानों, ऋतुओं और त्योहारों से जुड़ी हैं। उदाहरण के लिए, पंजाब की गिद्दा, राजस्थान की घूमर, गुजरात का गरबा और दांडिया, महाराष्ट्र का लावणी, केरल का भरतनाट्यम, मणिपुर का मणिपुरी आदि प्रसिद्ध नृत्य हैं।
भारतीय नृत्य में हाथों की विभिन्न मुद्राएँ भावों को व्यक्त करने का माध्यम हैं। नर्तक अपनी आँखों, भौंहों और नासिका के माध्यम से भी भावों को अभिव्यक्त करते हैं।
लोक नृत्यों से शास्त्रीय नृत्यों का विकास हुआ है। दोनों के बीच संवाद भारतीय नृत्य कला की ताकत है।
मुख्य बिंदु
- भरतमुनि का नाट्यशास्त्र नृत्य का आधार।
- नृत्य में अभिनय, भाव और भंगिमा।
- लोक नृत्यों की विविधता और सांस्कृतिक महत्व।
- शास्त्रीय नृत्यों के प्रमुख रूप।
- हाथों की मुद्राओं का महत्व।
पाठ्य प्रमाण
"भारतीय नर्तकों को आँख, भौंहो या फिर नासिका के माध्यम से ही खुशी, दुख, क्रोध, वीभत्स आदि भावों को अभिव्यक्त करने में महारत हासिल है।"
अभ्यास प्रश्न
- सरल: नृत्य कला में अभिनय का क्या महत्व है?
- मध्यम: भारतीय लोक नृत्यों की विशेषताएँ क्या हैं?
- कठिन: शास्त्रीय और लोक नृत्यों के बीच संबंध पर चर्चा करें।
उत्तर कुंजी
नृत्य में अभिनय भावों को व्यक्त करने का माध्यम है। लोक नृत्य जीवन और प्रकृति से जुड़े हैं। शास्त्रीय नृत्य शास्त्रों और नियमों पर आधारित होते हैं। दोनों के बीच संवाद भारतीय नृत्य कला की ताकत है।
शब्दावली
- नाट्यशास्त्र: भरतमुनि द्वारा रचित नृत्य और अभिनय का शास्त्र।
- नर्त्य: अभिनय।
- नृत्य: भाव और भंगिमा के साथ नृत्य।
- मुद्रा: हाथों की विभिन्न आकृतियाँ।
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