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पतझर-में-टूटी-पत्तियाँ

CLASS 10 . HINDI . स्पर्श भाग 2 . पतझर में-टूटी-पत्तियाँ

Chapter 13 : पतझर में टूटी पत्तियाँ

Ch 13

HINDI

CLASS 10

रवींद्र केलेकर का परिचय

रवींद्र केलेकर का जन्म 7 मार्च 1925 को कोंकण क्षेत्र में हुआ था। वे छात्र जीवन से ही गोवा मुक्ति आंदोलन में सक्रिय रहे। गांधीवादी चिंतक के रूप में प्रसिद्ध केलेकर ने अपने लेखन में जन-जीवन के विविध पहलुओं, मान्यताओं और व्यक्तिगत विचारों को देश और समाज के संदर्भ में प्रस्तुत किया। उनकी टिप्पणियाँ अनुभवजन्य और मौलिक चिंतन से परिपूर्ण हैं, जो मानवीय सत्य की खोज में सहायक हैं।

वे कोंकणी और मराठी के प्रमुख लेखक और पत्रकार थे। कोंकणी में उनकी पच्चीस, मराठी में तीन, हिंदी और गुजराती में भी कुछ पुस्तकें प्रकाशित हुईं। उन्होंने काका कालेलकर की कई पुस्तकों का संपादन और अनुवाद भी किया। गोवा कला अकादमी सहित कई पुरस्कारों से सम्मानित केलेकर की प्रमुख कृतियाँ हैं: कोंकणी में "उजवाढाचे सूर", "समिधा", "सांगली", "ओथांबे"; मराठी में "कोंकणीचें राजकरण", "जापान जसा दिसला"; और हिंदी में "पतझर में टूटी पत्तियाँ"।

मुख्य बिंदु

  • कोंकणी, मराठी, हिंदी और गुजराती में लेखन
  • गोवा मुक्ति आंदोलन में सक्रियता
  • गांधीवादी चिंतक
  • प्रमुख कृतियाँ और पुरस्कार

अभ्यास प्रश्न

  • रवींद्र केलेकर का जन्म कब और कहाँ हुआ था?
  • उनकी प्रमुख भाषाएँ और कृतियाँ कौन-कौन सी हैं?
  • वे किस आंदोलन में सक्रिय थे?

उत्तर कुंजी

  • 7 मार्च 1925 को कोंकण क्षेत्र में जन्म
  • कोंकणी, मराठी, हिंदी, गुजराती; प्रमुख कृतियाँ: "उजवाढाचे सूर", "पतझर में टूटी पत्तियाँ" आदि
  • गोवा मुक्ति आंदोलन

शब्दावली

  • गांधीवादी: महात्मा गांधी के विचारों का अनुयायी
  • अनुभवजन्य: अनुभव पर आधारित
  • चिंतक: विचारक

पाठ प्रवेश

ऐसा माना जाता है कि थोड़े में बहुत कुछ कह देना कविता का गुण है। जब कभी यह गुण किसी गद्य रचना में भी दिखाई देता है तब उसे पढ़ने वाले को यह मुहावरा याद नहीं रखना पड़ता कि 'सार-सार को गहि रहे, थोथा देय उड़ाय'। सरल लिखना, थोड़े शब्दों में लिखना ज़्यादा कठिन काम है। फिर भी यह काम होता रहा है। सूक्ति कथाएँ, आगम कथाएँ, जातक कथाएँ, पंचतंत्र की कहानियाँ उसी लेखन के प्रमाण हैं। यही काम कोंकणी में रवींद्र केलेकर ने किया है।

प्रस्तुत पाठ के प्रसंग पढ़ने वालों से थोड़ा कहा बहुत समझना की माँग करते हैं। ये प्रसंग महज पढ़ने-गुनने की नहीं, एक जागरूक और सक्रिय नागरिक बनने की प्रेरणा भी देते हैं। पहला प्रसंग गिन्नी का सोना जीवन में अपने लिए सुख-साधन जुटाने वालों से नहीं बल्कि उन लोगों से परिचित कराता है जो इस जगत को जीने और रहने योग्य बनाए हुए हैं।

दूसरा प्रसंग झेन की देन बौद्ध दर्शन में वर्णित ध्यान की उस पद्धति की याद दिलाता है जिसके कारण जापान के लोग आज भी अपनी व्यस्ततम दिनचर्या के बीच कुछ चैन भरे पल पा जाते हैं।

पतझर में टूटी पत्तियाँ

"पतझर में टूटी पत्तियाँ" रवींद्र केलेकर की एक महत्वपूर्ण रचना है जिसमें दो प्रसंग प्रस्तुत हैं: "गिन्नी का सोना" और "झेन की देन"।

(I) गिन्नी का सोना

शुद्ध सोना अलग है और गिन्नी का सोना अलग। गिन्नी के सोने में थोड़ा-सा ताँबा मिलाया हुआ होता है, इसलिए वह ज़्यादा चमकता है और शुद्ध सोने से मज़बूत भी होता है। औरतें अकसर इसी सोने के गहने बनवा लेती हैं।

फिर भी होता तो वह है गिन्नी का ही सोना।

शुद्ध आदर्श भी शुद्ध सोने के जैसे ही होते हैं। चंद लोग उनमें व्यावहारिकता का थोड़ा-सा ताँबा मिला देते हैं और चलाकर दिखाते हैं। तब हम लोग उन्हें 'व्यावहारिक आदर्शवादी' कहकर उनका बखान करते हैं।

पर बात न भूलें कि बखान आदर्शों का नहीं होता, बल्कि व्यावहारिकता का होता है। और जब व्यावहारिकता का बखान होने लगता है तब 'व्यावहारिक आदर्शवादियों' के जीवन से आदर्श धीरे-धीरे पीछे हटने लगते हैं और उनकी व्यावहारिक सूझबूझ ही आगे आने लगती है। सोना पीछे रहकर ताँबा ही आगे आता है।

चंद लोग कहते हैं, गांधीजी 'व्यावहारिक आदर्शवादी' थे। व्यावहारिकता को पहचानते थे। उसकी कीमत जानते थे। इसीलिए वे अपने विलक्षण आदर्श चला सके। वरना हवा में ही उड़ते रहते। देश उनके पीछे न जाता।

हाँ, पर गांधीजी कभी आदर्शों को व्यावहारिकता के स्तर पर उतरने नहीं देते थे। बल्कि व्यावहारिकता को आदर्शों के स्तर पर चढ़ाते थे। वे सोने में ताँबा नहीं बल्कि ताँबे में सोना मिलाकर उसकी कीमत बढ़ाते थे।

इसलिए सोना ही हमेशा आगे आता रहता था।

व्यवहारवादी लोग हमेशा सजग रहते हैं। लाभ-हानि का हिसाब लगाकर ही कदम उठाते हैं। वे जीवन में सफल होते हैं, अन्यों से आगे भी जाते हैं पर क्या वे ऊपर चढ़ते हैं। खुद ऊपर चढ़ें और अपने साथ दूसरों को भी ऊपर ले चलें, यही महत्त्व की बात है। यह काम तो हमेशा आदर्शवादी लोगों ने ही किया है। समाज के पास अगर शाश्वत मूल्यों जैसा कुछ है तो वह आदर्शवादी लोगों का ही दिया हुआ है। व्यवहारवादी लोगों ने तो समाज को गिराया ही है।

मुख्य बिंदु

  • शुद्ध सोना और गिन्नी के सोने की तुलना
  • आदर्श और व्यावहारिकता का संबंध
  • गांधीजी के विचार और आदर्शवाद
  • व्यवहारवादी और आदर्शवादी जीवन दृष्टिकोण

पाठ्य प्रमाण

  • "शुद्ध सोना अलग है और गिन्नी का सोना अलग।"
  • "गांधीजी कभी आदर्शों को व्यावहारिकता के स्तर पर उतरने नहीं देते थे।"
  • "सोना ही हमेशा आगे आता रहता था।"

हल किए गए उदाहरण

प्रश्न: गिन्नी के सोने और शुद्ध सोने की तुलना से लेखक क्या समझाना चाहते हैं?

उत्तर: लेखक गिन्नी के सोने और शुद्ध सोने की तुलना के माध्यम से यह बताना चाहते हैं कि आदर्शों में व्यावहारिकता का थोड़ा मिश्रण उन्हें अधिक प्रभावी बनाता है, परंतु जब व्यावहारिकता अधिक हो जाती है तो आदर्श पीछे हटने लगते हैं। गांधीजी ने व्यावहारिकता को आदर्शों के स्तर पर उठाकर आदर्शों की महत्ता को बनाए रखा।

अभ्यास प्रश्न

  • गिन्नी के सोने में ताँबा क्यों मिलाया जाता है?
  • गांधीजी को 'व्यावहारिक आदर्शवादी' क्यों कहा जाता है?
  • लेखक के अनुसार व्यवहारवादी और आदर्शवादी जीवन दृष्टिकोण में क्या अंतर है?

उत्तर कुंजी

  • ताँबा मिलाने से गिन्नी का सोना अधिक चमकदार और मज़बूत होता है।
  • गांधीजी व्यावहारिकता को आदर्शों के स्तर पर उठाते थे, इसलिए उन्हें व्यावहारिक आदर्शवादी कहा जाता है।
  • व्यवहारवादी लोग लाभ-हानि देखकर कदम उठाते हैं, जबकि आदर्शवादी लोग समाज को ऊपर उठाने का प्रयास करते हैं।

त्वरित संदर्भ

  • गिन्नी का सोना: 22 कैरेट सोना जिसमें ताँबा मिला होता है।
  • आदर्श: सर्वोत्तम मानक या सिद्धांत।
  • व्यावहारिकता: व्यवहार में उपयोगी होना।

शब्दावली

  • व्यावहारिकता - समय और अवसर देखकर कार्य करने की सूझ
  • आदर्शवादी - ऐसे व्यक्ति जो सर्वोत्तम मानकों का पालन करते हैं
  • बखान - प्रशंसा या वर्णन
  • सूझबूझ - समझदारी
  • सजग - सचेत
  • शाश्वत - जो सदैव एक-सा रहे

(II) झेन की देन

जापान में लेखक ने अपने मित्र से पूछा कि वहाँ के लोगों को कौन-सी बीमारियाँ अधिक होती हैं। जवाब मिला कि मानसिक रोग अधिक हैं क्योंकि जीवन की रफ़्तार बहुत तेज़ हो गई है। लोग दौड़ते हैं, बकते हैं और दिमाग पर अत्यधिक दबाव पड़ता है जिससे तनाव बढ़ता है।

लेखक को एक टी-सेरेमनी में ले जाया गया, जो जापान की चाय पीने की एक विधि है। यह विधि शांति और ध्यान की शिक्षा देती है। वहाँ की छः मंजिली इमारत की छत पर एक सुंदर पर्णकुटी थी जहाँ चाय बनाई जाती थी। चाय बनाने और पीने की प्रक्रिया इतनी गरिमापूर्ण और शांतिपूर्ण थी कि दिमाग की रफ़्तार धीरे-धीरे कम हो गई और लेखक को वर्तमान क्षण में जीने का अनुभव हुआ।

झेन परंपरा की यह देन जापानियों को मानसिक शांति प्रदान करती है और वर्तमान में जीने की कला सिखाती है।

मुख्य बिंदु

  • जापान में मानसिक रोगों का बढ़ना
  • जीवन की तेज़ रफ़्तार और तनाव
  • टी-सेरेमनी की विधि और उसका महत्व
  • वर्तमान क्षण में जीने की कला
  • झेन परंपरा और ध्यान

पाठ्य प्रमाण

  • "यहाँ के अस्सी फ़ीसदी लोग मनोरुग्ण हैं।"
  • "चाय पीते-पीते उस दिन मेरे दिमाग से भूत और भविष्य दोनों काल उड़ गए थे।"
  • "टी-सेरेमनी में शांति मुख्य बात होती है।"

हल किए गए उदाहरण

प्रश्न: टी-सेरेमनी का जापानी जीवन में क्या महत्व है?

उत्तर: टी-सेरेमनी जापान में मानसिक शांति और ध्यान की एक विधि है जो जीवन की तेज़ रफ़्तार के बीच शांति प्रदान करती है। यह विधि वर्तमान क्षण में जीने की कला सिखाती है जिससे मानसिक तनाव कम होता है।

अभ्यास प्रश्न

  • जापान में मानसिक रोगों के बढ़ने का मुख्य कारण क्या है?
  • टी-सेरेमनी में चाय पीने की प्रक्रिया कैसी होती है?
  • झेन परंपरा से हमें क्या सीख मिलती है?

उत्तर कुंजी

  • जीवन की तेज़ रफ़्तार और दिमाग पर अत्यधिक दबाव के कारण मानसिक रोग बढ़ रहे हैं।
  • चाय पीने की प्रक्रिया गरिमापूर्ण, शांतिपूर्ण और ध्यानपूर्ण होती है।
  • वर्तमान में जीना और मानसिक शांति प्राप्त करना।

त्वरित संदर्भ

  • टी-सेरेमनी: जापान की चाय पीने की विधि।
  • झेन: बौद्ध धर्म की ध्यान पद्धति।
  • मनोरुग्ण: मानसिक तनाव से पीड़ित व्यक्ति।

शब्दावली

  • मानसिक - मस्तिष्क संबंधी
  • मनोरुग्ण - तनाव के कारण मानसिक रूप से अस्वस्थ
  • प्रतिस्पर्धा - होड़
  • स्पीड - गति
  • टी-सेरेमनी - जापान में चाय पीने का विशेष आयोजन
  • चा-नो-यू - जापानी में टी-सेरेमनी का नाम
  • दफ्ती - लकड़ी की खोखली सरकने वाली दीवार
  • पर्णकुटी - पत्तों से बनी कुटिया
  • बेढब-सा - बेडौल-सा
  • चाजीन - जापानी विधि से चाय पिलाने वाला
  • गरिमापूर्ण - सलीके से
  • भंगिमा - मुद्रा
  • जयजयवंती - एक राग का नाम
  • खदबदाना - उबलना
  • उलझन - असमंजस की स्थिति
  • अनंतकाल - वह काल जिसका अंत न हो
  • सन्नाटा - खामोशी
  • मिथ्या - भ्रम

शब्दार्थ और टिप्पणियाँ

  • व्यावहारिकता - समय और अवसर देखकर कार्य करने की सूझ
  • व्यावहारिक आदर्शवादी - व्यावहारिकता और आदर्शों का संतुलन बनाने वाला व्यक्ति
  • बखान - वर्णन करना या प्रशंसा करना
  • सूझबूझ - काम करने की समझ
  • स्तर - श्रेणी या स्तर
  • सजग - सचेत
  • शाश्वत - जो सदैव एक-सा रहे या जो बदला न जा सके
  • शुद्ध सोना - 24 कैरेट का (बिना मिलावट का) सोना
  • गिन्नी का सोना - 22 कैरेट (सोने में ताँबा मिला हुआ) का सोना जिससे गहने बनाए जाते हैं
  • मानसिक - मस्तिष्क संबंधी या दिमागी
  • मनोरुग्ण - तनाव के कारण मानसिक रूप से अस्वस्थ
  • प्रतिस्पर्धा - होड़
  • स्पीड - गति
  • टी-सेरेमनी - जापान में चाय पीने का विशेष आयोजन
  • चा-नो-यू - जापानी में टी-सेरेमनी का नाम
  • दफ्ती - लकड़ी की खोखली सरकने वाली दीवार जिस पर चित्रकारी होती है
  • पर्णकुटी - पत्तों से बनी कुटिया
  • बेढब-सा - बेडौल-सा
  • चाजीन - जापानी विधि से चाय पिलाने वाला
  • गरिमापूर्ण - सलीके से
  • भंगिमा - मुद्रा
  • जयजयवंती - एक राग का नाम
  • खदबदाना - उबलना
  • उलझन - असमंजस की स्थिति
  • अनंतकाल - वह काल जिसका अंत न हो
  • सन्नाटा - खामोशी
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