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पर्वत-प्रदेश-में-पावस

CLASS 10 . HINDI . स्पर्श भाग 2 . पर्वत प्रदेश-में-पावस

Chapter 4 : पर्वत प्रदेश में पावस

Ch 4

HINDI

CLASS 10

सुमित्रानंदन पंत का जीवन परिचय

सुमित्रानंदन पंत का जन्म 20 मई 1900 को उत्तराखंड के कौसानी-अलमोड़ा में हुआ था। बचपन से ही उनकी रुचि कविता लेखन में थी और सात वर्ष की आयु में उन्हें स्कूल में काव्य पाठ के लिए पुरस्कार मिला। 1915 से उन्होंने स्थायी रूप से साहित्य सृजन शुरू किया और छायावाद के प्रमुख स्तंभ के रूप में प्रसिद्ध हुए।

उनकी प्रारंभिक कविताओं में प्रकृति प्रेम और रहस्यवाद की झलक मिलती है। बाद में वे मार्क्स और महात्मा गांधी के विचारों से प्रभावित हुए। उनकी बाद की कविताओं में अरविंद दर्शन का प्रभाव भी स्पष्ट है।

सुमित्रानंदन पंत ने उदयशंकर संस्कृति केंद्र से जुड़कर जीविका प्राप्त की, आकाशवाणी के परामर्शदाता रहे और लोकायतन सांस्कृतिक संस्था की स्थापना की। 1961 में उन्हें पद्मभूषण सम्मान से नवाजा गया। वे हिंदी के पहले ज्ञानपीठ पुरस्कार विजेता भी थे।

उनके प्रमुख काव्य संग्रहों में कला, बूढ़ा चाँद, चिदंबरा, वीणा, पल्लव, युगवाणी, ग्राम्या, स्वर्णकिरण और लोकायतन शामिल हैं। उनका निधन 28 दिसंबर 1977 को हुआ।

पावस ऋतु और प्रकृति वर्णन

कविता "पर्वत प्रदेश में पावस" में पंत जी ने वर्षा ऋतु के दौरान पर्वतीय क्षेत्र की सुंदरता और परिवर्तित प्रकृति का मनोहारी चित्र प्रस्तुत किया है। कविता में मेखलाकार पर्वत, झरने, जल, और आकाश की छटा को बहुत ही सजीवता से दर्शाया गया है।

प्रकृति के विभिन्न रूपों जैसे पर्वत की ढाल, झरनों की बूँदें, और बादलों के खेल को कवि ने बड़े ही सूक्ष्म और भावपूर्ण तरीके से प्रस्तुत किया है। यह कविता पाठकों को ऐसा अनुभव कराती है जैसे वे स्वयं पर्वतीय क्षेत्र में वर्षा ऋतु का आनंद ले रहे हों।

काव्य के मुख्य बिंदु

  • प्रकृति प्रेम और पर्वतीय सौंदर्य का चित्रण।
  • वर्षा ऋतु की विविध छवियाँ जैसे मेखलाकार पर्वत, झरने, जल का प्रतिबिंब।
  • प्रकृति के रूपों में परिवर्तन और जीवन की गतिशीलता।
  • काव्य में छायावाद की छाया और भावनात्मक अभिव्यक्ति।
  • महाप्राण निराला द्वारा पंत जी की शेली की प्रशंसा।

काव्य के प्रमुख उद्धरण और व्याख्या

"पावस ऋतु थी, पर्वत प्रदेश, पल-पल परिवर्तित प्रकृति-वेश।" – इस पंक्ति में वर्षा ऋतु के दौरान प्रकृति के निरंतर बदलते रूप को दर्शाया गया है।

"गिरि का गौरव गाकर झर-झर मद में नस-नस उत्तेजित कर" – यहाँ पर्वत की महिमा और झरनों की मस्ती को व्यक्त किया गया है।

"है टूट पड़ा भू पर अंबर! धँस गए धरा में सभय शाल!" – यह पंक्ति वर्षा के प्रकोप और प्रकृति के परिवर्तन को दर्शाती है।

शब्दार्थ और टिप्पणियाँ

  • पावस - वर्षा ऋतु
  • प्रकृति-वेश - प्रकृति का रूप
  • मेखलाकार - करघनी के आकार की पहाड़ की ढाल
  • सहस्र - हज़ार
  • दृग-सुमन - पुष्प रूपी आँखें
  • अवलोक - देखना
  • महाकार - विशाल आकार
  • दर्पण - आईना
  • मद - मस्ती
  • झाग - फेन
  • उर - हृदय
  • उच्चाकांक्षा - ऊँचा उठने की कामना
  • तरुवर - पेड़
  • नीरव नभ - शांत आकाश
  • अनिमेष - एकटक
  • चिंतापर - चिंता में डूबा हुआ
  • भूधर - पहाड़
  • पारद के पर - पारे के समान चमकीले पंख
  • रव-शेष - केवल आवाज़ का रह जाना
  • सभय - भय के साथ
  • शाल - एक वृक्ष का नाम
  • ताल - तालाब
  • जलद-यान - बादल रूपी विमान
  • विचर - घूमना
  • इंद्रजाल - जादूगरी

पावस में प्रकृति सौंदर्य का अनुभव

कविता पढ़ते हुए पाठक को ऐसा अनुभव होता है कि वह स्वयं पर्वतीय क्षेत्र में वर्षा ऋतु का आनंद ले रहा है। कवि ने प्रकृति के सौंदर्य को इतने जीवंत शब्दों में प्रस्तुत किया है कि पाठक की सभी चिंताएँ और बाधाएँ दूर हो जाती हैं।

यह कविता प्रकृति प्रेम की भावना को जागृत करती है और छायावादी काव्य शैली की विशेषता को दर्शाती है।

अभ्यास प्रश्न

स्तर 1 – सरल

  • सुमित्रानंदन पंत का जन्म कहाँ हुआ था?
  • कविता "पर्वत प्रदेश में पावस" में किस ऋतु का वर्णन है?
  • "मेखलाकार पर्वत" का क्या अर्थ है?

स्तर 2 – मध्यम

  • सुमित्रानंदन पंत की कविताओं में प्रकृति प्रेम कैसे प्रकट होता है? उदाहरण सहित समझाइए।
  • कविता में वर्षा ऋतु के दौरान प्रकृति के परिवर्तनों का वर्णन कैसे किया गया है?

स्तर 3 – कठिन

  • कविता "पर्वत प्रदेश में पावस" में छायावाद की विशेषताएँ कैसे दिखाई देती हैं? विस्तार से लिखिए।
  • महाप्राण निराला ने सुमित्रानंदन पंत की शेली की क्या प्रशंसा की है? अपने शब्दों में समझाइए।

उत्तर कुंजी

स्तर 1 – सरल

  • उत्तर: सुमित्रानंदन पंत का जन्म उत्तराखंड के कौसानी-अलमोड़ा में हुआ था।
  • उत्तर: कविता में वर्षा ऋतु (पावस) का वर्णन है।
  • उत्तर: मेखलाकार पर्वत का अर्थ है करघनी के आकार की पहाड़ की ढाल।

स्तर 2 – मध्यम

  • उत्तर: पंत की कविताओं में प्रकृति प्रेम स्पष्ट रूप से दिखाई देता है। वे पर्वतीय क्षेत्र की सुंदरता, झरनों की मस्ती और वर्षा ऋतु के परिवर्तनों को भावपूर्ण शब्दों में प्रस्तुत करते हैं। उदाहरण के लिए, "गिरि का गौरव गाकर झर-झर मद में नस-नस उत्तेजित कर" पंक्ति में प्रकृति की जीवंतता प्रकट होती है।
  • उत्तर: कविता में वर्षा ऋतु के दौरान प्रकृति के रूप निरंतर बदलते हैं। मेखलाकार पर्वत, झरने, जल का प्रतिबिंब, और आकाश की छटा को बड़े ही सूक्ष्मता से दर्शाया गया है। यह परिवर्तन प्रकृति की गतिशीलता और जीवन के चक्र को दर्शाता है।

स्तर 3 – कठिन

  • उत्तर: छायावाद की विशेषताएँ कविता में प्रकृति प्रेम, रहस्यवाद, और भावनात्मक अभिव्यक्ति के रूप में प्रकट होती हैं। पंत ने प्रकृति के विभिन्न रूपों को उपमाओं और अलंकारों के माध्यम से सुंदरता से प्रस्तुत किया है।
  • उत्तर: महाप्राण निराला ने पंत की शेली की प्रशंसा करते हुए कहा कि वे शेली की तरह अपने विषय को अनेक उपमाओं से सँवारकर मधुर और कोमल बना देते हैं। इसका अर्थ है कि पंत की कविता में सौंदर्य और कोमलता का अद्भुत समन्वय है।

त्वरित संदर्भ

  • सुमित्रानंदन पंत: छायावाद के प्रमुख कवि, पद्मभूषण और ज्ञानपीठ पुरस्कार विजेता।
  • कविता का विषय: वर्षा ऋतु में पर्वतीय क्षेत्र की प्रकृति।
  • मुख्य भाव: प्रकृति प्रेम, परिवर्तनशीलता, और सौंदर्य।
  • प्रमुख अलंकार: उपमा, अनुप्रास, रूपक।

शब्दावली

  • पावस: वर्षा ऋतु
  • प्रकृति-वेश: प्रकृति का रूप
  • मेखलाकार: करघनी के आकार की पहाड़ की ढाल
  • सहस्र: हज़ार
  • दृग-सुमन: पुष्प रूपी आँखें
  • अवलोक: देखना
  • महाकार: विशाल आकार
  • दर्पण: आईना
  • मद: मस्ती
  • झाग: फेन
  • उर: हृदय
  • उच्चाकांक्षा: ऊँचा उठने की कामना
  • तरुवर: पेड़
  • नीरव नभ: शांत आकाश
  • अनिमेष: एकटक
  • चिंतापर: चिंता में डूबा हुआ
  • भूधर: पहाड़
  • पारद के पर: पारे के समान चमकीले पंख
  • रव-शेष: केवल आवाज़ का रह जाना
  • सभय: भय के साथ
  • शाल: एक वृक्ष का नाम
  • ताल: तालाब
  • जलद-यान: बादल रूपी विमान
  • विचर: घूमना
  • इंद्रजाल: जादूगरी

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