रवींद्रनाथ ठाकुर का परिचय
रवींद्रनाथ ठाकुर का जन्म 6 मई 1861 को बंगाल के एक समृद्ध परिवार में हुआ था। वे नोबेल पुरस्कार पाने वाले पहले भारतीय कवि हैं। उनकी शिक्षा-दीक्षा मुख्यतः घर पर हुई और उन्होंने स्वाध्याय के माध्यम से अनेक विषयों का ज्ञान प्राप्त किया। वे बैरिस्ट्री की पढ़ाई के लिए विदेश गए थे, लेकिन बिना परीक्षा दिए लौट आए।
रवींद्रनाथ की रचनाओं में लोक-संस्कृति का प्रभाव स्पष्ट रूप से दिखाई देता है। प्रकृति के प्रति उनका गहरा लगाव था। उन्होंने लगभग एक हजार कविताएँ और दो हजार गीत लिखे। चित्रकला, संगीत और भावनृत्य में उनकी रुचि के कारण उन्होंने रवींद्र संगीत नामक एक नई संगीतधारा की स्थापना की। उन्होंने शांति निकेतन नामक एक शैक्षिक और सांस्कृतिक संस्थान की स्थापना की, जो अपनी तरह का अनूठा संस्थान माना जाता है।
उनकी प्रमुख कृतियों में गीतांजलि (जिसके लिए उन्हें नोबेल पुरस्कार मिला), नैवैद्य, पूरबी, बलाका, क्षणिका, चित्र और सांध्यगीत, काबुलीवाला जैसी कहानियाँ, उपन्यास गोरा, घरे बाइरे और उनके निबंध शामिल हैं।
मुख्य बिंदु
- नोबेल पुरस्कार प्राप्त पहला भारतीय कवि
- लोक-संस्कृति और प्रकृति से गहरा लगाव
- रवींद्र संगीत की स्थापना
- शांति निकेतन संस्थान की स्थापना
- प्रमुख कृतियाँ: गीतांजलि, नैवैद्य, पूरबी, बलाका, काबुलीवाला, गोरा आदि
पाठ्य प्रमाण
"रवींद्रनाथ ठाकुर की प्रस्तुत कविता का बंगला से हिंदी में अनुवाद श्रद्धेय आचार्य हजारीप्रसाद द्विवेदी जी ने किया है।"
अभ्यास प्रश्न
- रवींद्रनाथ ठाकुर का जन्म कब और कहाँ हुआ था?
- रवींद्रनाथ ठाकुर की प्रमुख कृतियाँ कौन-कौन सी हैं?
- रवींद्र संगीत क्या है?
- शांति निकेतन संस्थान की विशेषता क्या है?
उत्तर कुंजी
- रवींद्रनाथ ठाकुर का जन्म 6 मई 1861 को बंगाल में हुआ था।
- उनकी प्रमुख कृतियों में गीतांजलि, नैवैद्य, पूरबी, बलाका, काबुलीवाला, गोरा आदि शामिल हैं।
- रवींद्र संगीत एक नई संगीतधारा है, जो रवींद्रनाथ के चित्रकला, संगीत और भावनृत्य के प्रति अनुराग से उत्पन्न हुई।
- शांति निकेतन एक अनूठा शैक्षिक और सांस्कृतिक संस्थान है जिसकी स्थापना रवींद्रनाथ ने की।
शब्दावली
- नोबेल पुरस्कार: विश्व प्रसिद्ध पुरस्कार जो उत्कृष्टता के लिए दिया जाता है।
- स्वाध्याय: स्वयं अध्ययन करना।
- लोक-संस्कृति: जन-जीवन की सांस्कृतिक परंपराएँ।
- भावनृत्य: भावों के माध्यम से किया गया नृत्य।
- संस्था: संगठन या संगठनात्मक इकाई।
आत्मत्राण कविता का विश्लेषण
"आत्मत्राण" रवींद्रनाथ ठाकुर की एक प्रसिद्ध कविता है, जिसमें कवि अपने प्रभु से यह प्रार्थना करते हैं कि वे विपदाओं से बचाने के बजाय उन्हें आत्मबल और साहस प्रदान करें ताकि वे स्वयं अपने संघर्षों का सामना कर सकें। कवि यह चाहते हैं कि वे भयभीत न हों और अपने दुःखों पर विजय प्राप्त करें।
कविता में यह भाव स्पष्ट है कि जीवन में आने वाली कठिनाइयों से बचना नहीं चाहिए, बल्कि उनका सामना स्वयं करना चाहिए। कवि प्रभु से केवल इतना चाहते हैं कि वे उन्हें तरने की शक्ति दें, न कि भार कम करें।
मुख्य बिंदु
- प्रभु से आत्मबल की प्रार्थना
- विपदाओं से बचाव नहीं, बल्कि सामना करने की शक्ति
- दुःखों पर विजय पाने की इच्छा
- स्वयं पर निर्भर रहने का संदेश
पाठ्य प्रमाण
"विपदाओं से मुझे बचाओ, यह मेरी प्रार्थना नहीं
केवल इतना हो (करुणामय)
कभी न विपदा में पाऊँ भय।"
हल किए गए उदाहरण
प्रश्न: कवि "आत्मत्राण" में प्रभु से क्या चाहते हैं?
उत्तर: कवि चाहते हैं कि प्रभु उन्हें विपदाओं से बचाने के बजाय आत्मबल दें ताकि वे स्वयं अपने दुःखों और कठिनाइयों का सामना कर सकें। वे चाहते हैं कि उन्हें डर न लगे और वे निर्भय होकर जीवन की चुनौतियों से लड़ सकें।
अभ्यास प्रश्न
- कवि "आत्मत्राण" में किस प्रकार की सहायता की कामना करते हैं?
- कविता में विपदाओं के प्रति कवि का दृष्टिकोण क्या है?
- "आत्मत्राण" कविता से कोई दो पंक्तियाँ लिखिए और उनका अर्थ समझाइए।
उत्तर कुंजी
- कवि प्रभु से आत्मबल और साहस की सहायता की कामना करते हैं।
- कवि विपदाओं से बचने के बजाय उनका सामना करने का पक्षधर है।
- "कभी न विपदा में पाऊँ भय" का अर्थ है कि विपत्ति में डर न लगे।
"दुख को मैं कर सकूँ सदा जय" का अर्थ है कि दुःख पर हमेशा विजय प्राप्त कर सकूँ।
शब्दावली
- विपदा: मुसीबत, संकट।
- करुणामय: दयालु।
- सांत्वना: तसल्ली देना।
- पौरुष: साहस, शक्ति।
- त्राण: रक्षा, बचाव।
- अनामय: स्वस्थ।
- वंचना: धोखा देना।
- संशय: संदेह।
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