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भारति-जय-विजयकरे

CLASS 9 . HINDI . गंगा . भारति जय-विजयकरे

Chapter 10 : भारति, जय, विजयकरे!

Ch 10

HINDI

CLASS 9

सूर्यकांत त्रिपाठी 'निराला' का परिचय

सूर्यकांत त्रिपाठी 'निराला' का जन्म सन् 1899 में बंगाल के महिषादल में हुआ था। वे मूलतः गढ़ाकोला (उन्नाव), उत्तर प्रदेश के निवासी थे। निराला की औपचारिक शिक्षा नौवीं कक्षा तक महिषादल में ही हुई। उन्होंने स्वाध्याय के माध्यम से संस्कृत, बांग्ला और अंग्रेजी भाषाओं का ज्ञान प्राप्त किया।

निराला हिंदी साहित्य के प्रमुख छायावादी कवि थे, जिन्होंने मुक्त छंद का प्रयोग सबसे पहले किया। उनकी रचनाओं में दार्शनिकता, विद्रोह, क्रांति, प्रेम की तरलता और प्रकृति का विराट चित्र देखने को मिलता है। वे उपन्यास, कहानी, आलोचना और निबंध लेखन में भी प्रसिद्ध हैं। उनकी रचनावली आठ खंडों में प्रकाशित है। निराला का निधन सन् 1961 में हुआ।

मुख्य बिंदु

  • जन्म और शिक्षा
  • भाषा ज्ञान और स्वाध्याय
  • प्रमुख काव्य रचनाएँ: अनामिका, परिमल, गीतिका, कुकुरमुत्ता, नए पत्ते
  • मुक्त छंद का प्रयोग
  • साहित्यिक विषय: दार्शनिकता, विद्रोह, प्रेम, प्रकृति
  • साहित्यिक योगदान: उपन्यास, कहानी, आलोचना, निबंध
  • निधन वर्ष: 1961

पाठ्य प्रमाण / उदाहरण

"निराला रचनावली के आठ खंडों में उनका संपूर्ण साहित्य प्रकाशित है।"

अभ्यास प्रश्न

  • निराला का जन्म कहाँ और कब हुआ था?
  • निराला ने किन भाषाओं का अध्ययन किया?
  • निराला की प्रमुख काव्य रचनाएँ कौन-कौन सी हैं?
  • निराला ने हिंदी कविता में किस छंद का प्रयोग सबसे पहले किया?
  • निराला की रचनाओं में कौन-कौन से विषय प्रमुख हैं?

उत्तर कुंजी

  • निराला का जन्म सन् 1899 में बंगाल के महिषादल में हुआ था।
  • उन्होंने संस्कृत, बांग्ला और अंग्रेजी भाषाओं का अध्ययन किया।
  • उनकी प्रमुख काव्य रचनाएँ हैं: अनामिका, परिमल, गीतिका, कुकुरमुत्ता, नए पत्ते।
  • निराला ने मुक्त छंद का प्रयोग सबसे पहले किया।
  • उनकी रचनाओं में दार्शनिकता, विद्रोह, प्रेम और प्रकृति के विषय प्रमुख हैं।

शब्दावली

  • स्वाध्याय: स्वयं अध्ययन
  • मुक्त छंद: बिना छंदबद्ध नियम के कविता
  • दार्शनिकता: जीवन और ब्रह्मांड के गहरे विचार
  • विद्रोह: विरोध या बगावत
  • तरलता: सहजता, प्रवाह
  • विराट: विशाल, बड़ा

कविता 'भारति, जय, विजयकरे!' का विश्लेषण

कविता 'भारति, जय, विजयकरे!' सूर्यकांत त्रिपाठी 'निराला' की देशभक्ति से ओत-प्रोत प्रेरणादायक रचना है। इस कविता में कवि भारत को एक देवी के रूप में प्रस्तुत करता है, जिसकी भौगोलिक सुंदरता और प्राकृतिक वैभव का चित्रण किया गया है।

मुख्य बिंदु

  • कविता की शुरुआत में भारत को "भारति, जय, विजयकरे!" कहकर विजय की कामना।
  • भारतभूमि को "कनक-शस्य-कमलधरे" कहकर उसकी कृषि और सौंदर्य की प्रशंसा।
  • प्राकृतिक सौंदर्य का चित्रण: लंका, सागर, नदी, वन, हिमालय, गंगा आदि।
  • भारत को चेतन सत्ता के रूप में देखना, जहाँ 'ओंकार' की गूँज है।
  • कविता में देशप्रेम और प्राकृतिक सौंदर्य का समन्वय।

पाठ्य प्रमाण / उदाहरण

"भारति, जय, विजयकरे! कनक-शस्य-कमलधरे!"

"लंका पदतल शतदल, गर्जितोर्मि सागर-जल धोता शुचि चरण युगल"

"तरु-तृण-वन-लता वसन, अंचल में खचित सुमन; गंगा ज्योतिर्जल-कण धवल धार हार गले।"

"मुकुट शुभ्र हिम-तुषार, प्राण प्रणव ओंकार, ध्वनित दिशाएँ उदार, शतमुख-शतरव-मुखरे!"

अभ्यास प्रश्न

  • कविता में भारत को किस रूप में प्रस्तुत किया गया है?
  • कविता के आरंभ में कवि क्या कामना करता है?
  • भारत की प्राकृतिक सुंदरता के कौन-कौन से उदाहरण कविता में दिए गए हैं?
  • कविता में 'ओंकार' का क्या महत्व है?
  • कविता में देशप्रेम कैसे व्यक्त हुआ है?

उत्तर कुंजी

  • भारत को एक देवी के रूप में प्रस्तुत किया गया है।
  • कवि भारत की विजय की कामना करता है।
  • लंका, सागर, नदी, वन, हिमालय, गंगा आदि प्राकृतिक सुंदरता के उदाहरण हैं।
  • 'ओंकार' भारत की चेतनता और आध्यात्मिकता का प्रतीक है।
  • देशप्रेम प्राकृतिक सौंदर्य और भारत की महत्ता के माध्यम से व्यक्त हुआ है।

शब्दावली

  • भारति/भारती: सरस्वती, वाणी, भारतमाता
  • कनक: सोना, चंपा
  • शस्य: फसल, खेती
  • पदतल: पैरों के नीचे
  • शतदल: कमल
  • गर्जितोर्मि: बादलों का गर्जन
  • शुचि: पवित्र, शुद्ध
  • युगल: जोड़ा
  • स्तव: प्रशंसा
  • तरु: वृक्ष
  • तृण: घास
  • लता: बेल
  • वसन: वस्त्र
  • अंचल: कोना, तट
  • खचित: अंकित
  • सुमन: पुष्प
  • ज्योतिर्जल: प्रकाश
  • धवल: सफेद
  • धार: वर्षा
  • शुभ्र: उज्ज्वल
  • हिम: बर्फ
  • तुषार: बर्फ के कण
  • प्राण: जीवन
  • प्रणव: ओंकार
  • ओंकार: 'ओम्' मंत्र
  • उदार: दयालु
  • शतमुख: सौ मुख
  • शतरव: शब्द शोर
  • मुखरे: शोर करने वाला

HINDI — ALL CHAPTERS

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दो बैलों की कथा

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आखिरी चट्टान तक

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राम-लक्ष्मण-परशुराम संवाद

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